कर्तव्य और अधिकार

   आज एक विडियो देख रही थी, उसमें हमारे अधिकारों के विषय पर  चर्चा  हो  रही थी|
अधिकार  शब्द जैसे ही सुनते है तो हर एक व्यक्ति के  अतंर मन में अलग - अलग विचार आते है| किसी  का तात्पर्य सम्पति से होता है किसी का सम्मान  से परन्तु  कितने लोग  ऐसे  होते  है जो अधिकार से पहले कर्तव्य की बात करते  हैं | कर्तव्य शब्द  का एक अपना विस्तृत  स्वरूप है, इसपर तो  बहुत  लम्बी  चर्चा की जा सकती है| हम सब अधिकार जताने समय अपने कर्तव्यों को भूल  जाते है | तो अधिकार की बात करेेंं ही  क्यों ? ये तो वो देश है जहाँ कर्तव्यपरायण  की इतनी कमी हैै कि लोगों को काम करते -करते पानी और चयास बहुत लगती है| लोग काम करना ही नहीं  चाहते  हाँ परन्तु  तनख्वाह  पूरी चाहिए | 
       समझ की बात है कोई  अपना कर्तव्य निभाने में इतना मग्न हो जाता है कि उसे अपने अधिकार याद नहीं  रहते,  तो कोई अपने कर्त्तव्यों का ही विस्मरण कर देता है|
           

    

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